Posts

आखिर क्यूं?

 जब किसी की आदत सी हो जाती है, दुनियां हमारी खुशहाल हो जाती है। खिलने लगती है कलियां गुलाब के जैसी, जिंदगी जीने की वजह बन जाती है। खोए रहते हैं हरदम खयालों में, ना जाने कब सुबह से शाम हो जाती है। खो जाता है दिन का चैन भी, रातों की नींद भी उड़ जाती है। ऐसा ही होता है , जब किसी की आदत सी हो जाती है। फिर होता है कुछ यूं,  यादें यादें बन जाती है। हो जाती है दुनियां वीरान,  जिंदगी नजर न आती है। गिनते रहते है तारे रात भर, रातें न कट पाती है। ऐसा क्यूं होता है , जब किसी की आदत बन जाती है। क्यूं कोई हमारी दुनिया में आता है, आकर अपनी आदत बना कर चला जाता है। जिंदगी जीने की वजह बनकर, जिंदगी वीरान करके चला जाता है। Kyu....     Kyu......      आखिर    kyu...... उमाकांत शर्मा जयपुर (राजस्थान)

हौंसला

 आजाद लवों का पंछी हूं, यूं ही चहचहाता रहूंगा। तुम ताकते रहो आसमान, मैं पंखों से आसमां मापता रहूंगा।। राह भी मिलेगी, मंजिल भी मिलेगी। मंजिल को उसकी औकात दिखाता रहूंगा । सपनों के पंखों से आसमां मापता रहूंगा।। देखे है जो ख्वाब मुकम्मल भी होंगे, ख्वाबों को हकीकत बनाता रहूंगा। आजाद लवों का पंछी हूं, मैं यूं ही गुनगुनाता रहूंगा।। गिरूंगा, उठूंगा, फिर दौडूंगा, सफल राह की थाह भी लूंगा। हौसलों को पस्त न होने दूंगा। आजाद लवों का पंछी हूं यूं ही चहचहाता रहूंगा।। उमाकांत शर्मा जयपुर (राजस्थान)

बेरोजगार

Image
आज फिर एक फॉर्म भर आया है, एक नई उम्मीद जगा लाया है। बचत के पैसे भी खर्च कर आया है, एक बेरोजगार उम्मीद जगा लाया है। दुनिया के ताने सुन सुन कर , अंदर से है वो टूट रहा। एक नौकरी की खातिर, हंसना मुस्कुराना वो भूल रहा। नहीं याद उसे कब वो मुस्कुराया है, एक बेरोजगार उम्मीद जगा लाया है। बेरोजगारी का दंस झेल, टूट चुका वो अंदर से। नई भर्ती को आया देख , बोल उठा अंतर्मन से। फिर से तैयारी का छाया साया है, एक बेरोजगार उम्मीद जगा लाया है। अब फिर कोचिंग के चक्कर काटो, छोड़ो भूख और नींद को। घरवालों से मिलना छोड़, भूल गया त्योहारों को। सोचता क्या परिणाम आने वाला है, एक बेरोजगार उम्मीद जगा लाया है। समय का उसे ध्यान नहीं, भूल गया दिन रात को। किताबों में  खोया हुआ, भूल गया अपने आप को। मस्ती को खोते हुए आया है , एक बेरोजगार उम्मीद जगा लाया है। इम्तिहान का दिन सुनकर , बढ़ती उसकी धड़कन है। नींद भूख को भूल कर, किताबों में लगी उलझन है  आज फिर एक इम्तिहान देने आया है, एक बेरोजगार उम्मीद जगा लाया है। आज फिर एक फॉर्म भर आया है, एक बेरोजगार उम्मीद जगा लाया है। लेखक :  उमाकांत  शर्मा

नववर्ष

 "बाबूजी, एक पेन ले लीजिए, सिर्फ दस रुपए का है।" ऋतिक ने देखा तो रोड पर एक 14 वर्ष। का लड़का जिसके कपड़े फटे हुए थे और सर्दी से कांप रहा था , पेन बेच रहा था। ऋतिक ने पूछा, " बेटा, तुम पेन क्यों बेच रहे हो? और स्कूल क्यों नहीं गए?"  लड़के ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया - " बाबूजी पेन नहीं बेचूंगा तो रोटी कहां से खाऊंगा ? और बाबूजी मेरे पास इतने रुपए नहीं है कि मै किताब खरीद सकूं और पढ़ सकूं।"  ऋतिक की आंखें नम हो गई क्योंकि ऐसे दौर से वो भी गुजर चुका था। ऋतिक ने पूछा -" बेटा आज तो न्यू ईयर है, क्या तुमने सेलीब्रेट नहीं की ?" बच्चे ने मासूमियत से पूछा -" ये न्यू ईयर क्या होती है बाबूजी ?" ऋतिक - बेटा, पुराना साल ख़तम हो गया और अब नया साल आ गया। लड़का। - तो क्या नए साल में सभी को भरपेट खाना मिल पाएगा ? अब ऋतिक अपने आंसू रोक नहीं पाया और बच्चे को गोद में उठाते हुए बोला , सबका तो नहीं पता बेटा, लेकिन आज से तू भूखा नहीं सोएगा। तेरे परिवार में और कौन कौन है ? लड़का बोला मै तो अनाथ हूं बाबूजी। ऋतिक बोला आज से तू अनाथ नहीं बेटा, तू मेरे साथ चलेगा...

*इतना तो तुझे जानता ही हूं।*

 *इतना तो तुझे जानता ही हूं।* इतना तो तुझे जानता ही हूं, तू मेरी दुनिया है ये तो पहचानता ही हूं। तेरे गुस्से के पीछे छुपे प्यार को पहचानता हूं, जानता हूं तू झगड़ती है तो अपना ही समझ कर। गैरों से कोन झगड़ा करता है, तेरे इस प्यार को तो पहचानता ही हूं, इतना तो तुझे जानता ही हूं। जानता हूं कभी कभी मुझे जलाने  लिए तू मुझे जानबूझ कर इग्नोर करती है, फिर मेरे गुस्सा होने पर प्यार जताती है, तेरे इस प्यार के तरीके को पहचानता ही हूं, हां इतना तो तुझे जानता ही हूं। हमारे भविष्य की बात करने पर तू कहती है, ना जी ना मैने नहीं करनी तेरे साथ अपनी जिंदगी ख़राब, तेरे इस मजाक की सच्चाई को तो जानता ही हूं, हां इतना तो तुझे जानता ही हूं। मेरी तकलीफ में तू मेरा साथ देती है, खयाल रखना अपना बार बार कहती है, तेरी इस केयरिंग को तो पहचानता ही हूं, हां इतना तो तुझे जानता ही हूं। मेरे गुड मॉर्निंग के मैसेज से तेरा जागना, और मेंरी गुड नाईट से तेरा सो जाना, तेरी इस स्पेशल फीलिंग को पहचानता ही हूं, हां इतना तो तुझे जानता ही हूं। उमाकांत शर्मा

तन्हा हूं मैं

*तन्हा* *हूं* *मै* जब रात को तेरे बारे में सोचता हूं तब लगता है तन्हा हूं मै। जानता हूं तेरा संदेश नहीं आएगा फिर भी मोबाइल की घंटी सुनकर मोबाइल चेक करता हूं तब लगता है तन्हा हूं मै। किसी फिल्म के रोमांटिक सीन पर तुझे याद करता हूं तब लगता है तन्हा हूं मै। आज भी जब दोस्त तेरे नाम की सौगंध देते है तब लगता है तन्हा हूं मै। तू नहीं आएगी लौट कर मेरे पास फिर भी दिल को तसल्ली देता हूं  तब लगता है तन्हा हूं मै। आज भी तेरी फोटो को देखते रहता हूं  तब लगता है तन्हा हूं मै। तुझे भूलने की कोशिश करता हूं लेकिन भूल नहीं पाता तब लगता है तन्हा हूं मै। तेरे साथ बिताए पल को महसूस करके मुस्कुराता हूं  तब लगता है तन्हा हूं मै। तेरे नाम वाले को जब कोई पुकारता है तो चौंक कर देखता हूं तब लगता है तन्हा हूं मैं। आज भी तेरा लास्ट सीन चेक करता हूं , तब लगता है तन्हा हूं मै। तेरा हंसना मुस्कुराना और फिर तेरी आंखो में मेरा डूब जाना, याद करता हूं, तब लगता है तन्हा हूं मै।                              उमाकांत शर्मा